वे लोग जिन्होंने शिर्डी के सांईं बाबा को देखा: भाग एक | Those who saw Sai Baba of Shirdi: Part One

Those who saw Sai Baba of Shirdi: Part One

श्री सांईं बाबा जब शिर्डी में अपनी लीला कर रहे थे तब उनके साथ कई लोग थे। उनमें से कुछ उनके विरोधी भी थे, तो कुछ समर्थक। आज भी यह सिलसिला जारी है। यूं तो बाबा को साक्षात देखने वालों की लिस्ट में सैकड़ों लोग हैं लेकिन यहां उन लोगों के नाम लिख रहे हैं जिन्होंने बाबा के साथ बहुत वक्त बिताया।

1. बायजा बाई कोते पाटिलबायजा बाई बाबा के लिए रोज खाना लाती थीं। बायजा बाई की मृत्यु के पश्चात उनका बेटा तात्या प्रतिदिन बाबा के लिए खाना बनाकर लाता था। बाबा ने दोनों की नि:स्वार्थ भक्ति का प्रतिफल भी दिया।

2. तात्या कोते पाटिलतात्या बाबा को ‘मामा’ कहते थे लेकिन बाबा कहते थे कि तू तो मेरा भाई है। तात्या हमेशा बाबा के साथ ही रहते थे। 1945 में तात्या कोते पाटिल का देहांत हो गया।

म्हालसापतिम्हालसापति का पूरा नाम म्हालसापति चिमनजी नगरे था। उन्होंने ही बाबा को सबसे पहले ‘आओ सांईं’ कहकर पुकारा और उन्हें सांईं नाम दिया। म्हालसापति और तात्या ये दोनों ही रात को बाबा के साथ मस्जिद में ही सोया करते थे।

4. माधवराव देशपांडे (शामा)शामा या श्यामा ने शिर्डी में अध्ययन किया और बाद में जूनियर स्कूल में सहायक मास्टर बन गए थे। वे छात्रों को मस्जिद (द्वारकामाई) के अगले दरवाजे के कमरे में पढ़ाया कहते थे और वहीं की एक खिड़की से बाबा को देखा करते थे। बस, वहीं से उनके मन में भक्ति जाग्रत हुई और वे बाबा के हो गए।

5. बापू साहेब बूटीनागपुर के करोड़पति बापू साहब बूटी अक्सर बाबा से मिलने आया करते थे और वे वहां कुछ दिन रुकते भी थे। उन्होंने ही बाबा के लिए और उनके भक्तों के लिए रहने का स्थान बनवाया था जिसे आज ‘बूटी वाड़ा’ कहते हैं। उनका असली नाम गोपालराव मुकुण्ड था।

6. काका साहेब दीक्षितमुंबई के विले पार्ले निवासी सॉलिसिटर काका साहेब दीक्षित के योगदान से ही दीक्षित बाड़ा बना और उन्हीं के प्रयासों से 1922 में शिर्डी पब्लिक ट्रस्ट बना।

7. चांद पाटिलधूपखेड़ा के चांद पाटिल के ही गुम हो गए घोड़े को बाबा ने आवाज लगाकर बुला लिया था। इन्हीं चांद मियां के साथ बाबा एक बारात में शिर्डी गए थे। बाबा धूपखेड़ा में 9 साल रहे। यहां जिस पत्थर पर बाबा बैठते थे वह आज भी नीम के पेड़ के नीचे रखा है। उसी के बाजू में चांद पाटिल की कब्र है।

8. गोविंद रघुनाथ दाभोलकर (हेमाडपंत)
‘श्री सांईं सच्चरित्र’ के रचयिता गोविंद रघुनाथ दाभोळकर उर्फ ​​अण्णासाहेब को बाबा ने ही ​​हेमाडपंत नाम दिया था। उनका घर बांद्रा में आज भी है। दाभोलकर ने ‘श्री सांईं सच्चरित्र’ के 52 अध्यायों की रचना की थी। उनके देहांत के बाद 53वां अध्याय बी.वी. देव द्वारा पूर्ण किया गया।

9. लक्ष्मीबाई शिंदेबाबा के प्रारंभिक दिनों में लक्ष्‍मीबाई शिंदे ने उनकी बहुत मदद की जिसे बाबा ने हमेशा याद रखा। समाधि लेने से पूर्व उन्‍होंने लक्ष्‍मीबाई को 5 रुपए के साथ 4 रुपए के सिक्‍के दिए, जो कि कुल 9 रुपए थे। आज भी वे सिक्के सुरक्षित रखे हुए हैं।

10. राधा-कृष्णीसुंदरबाई क्षीरसागर (राधा-कृष्णी) नामक विधवा शिर्डी में रहने लगीं और बाबा तथा उनके भक्तों की सेवा करने लगीं। 9 वर्ष सेवा करने के बाद 35 वर्ष की उम्र में सन् 1916 में उनकी मृत्यु हो गई। राधा-कृष्णी के द्वारा ही चावड़ी में बाबा की शेजारती प्रारंभ की गई थी।

11. नानासाहेब निमोणकर
नानासाहेब निमोणकर, जो निमोण के निवासी और अवैतनिक न्यायाधीश थे, शिर्डी में अपनी पत्नी के साथ ठहरे हुए थे। निमोणकर की देखरेख में नानासाहेब चांदोरकर द्वारा द्वारकामाई का जीर्णोद्धार हुआ।

12. नाना साहेब चांदोरकरनाना साहेब चांदोरकर को बाबा ने गीता का उपदेश दिया था। बाबा ने नाना से कहा था, काम बनता है तो बाबा की प्रशंसा करते हो और काम बिगड़ता है तो बाबा को दोष देते हो, क्योंकि तुम्हारी भक्ति सशर्त है, मैं सशर्त भक्ति कैसे स्वीकार कर सकता हूं?

13. दादा साहेब खापर्डेगणेश कृष्ण खापर्डे (अमरावती वाले) बाबा के साथ 3-4 महीने रहे थे। उस अवधि में उन्होंने हर रोज डायरी लिखी थी और इस तरह 141 पृष्ठों की ‘खापर्डे की डायरी’ तैयार हो गई जिसमें बाबा के संबंध में कई अद्भुत बातें लिखी हैं।

14. लोकमान्य तिलकभारत के प्रसिद्ध राजनेता लोकमान्य तिलक बाबा के शुभाशीष के लिए खापर्डेजी के साथ शिर्डी आए थे और उन्होंने बाबा का दर्शन लाभ प्राप्त किया। यह बात बाबा के अंतिम दिनों की है।

15. कृष्णराव जोगेश्वर भीष्मभीष्म ने ‘श्री सांईं सगुणोपासना’ नामक किताब लिखी थी। केजे भीष्म ने रामनवमी उत्सव मनाने का विचार बाबा के समक्ष प्रस्तुत किया था और बाबा ने भी इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया था।

16. मेघाबीरमगांव के मेघा का देहांत हुआ, तब बापूसाहेब जोग ही मस्जिद और द्वारकामाई में आरती करने लगे, समाधि बनने तक।

17. दास गणु महाराजबाबा के बचपन के बीते वर्षों की अज्ञात जानकारी की खोज दासगुण महाराज ने ही की थी। दासगुण ने ही युवा सांईं बाबा को कबीर का अवतार माना था। वे पुलिस की नौकरी करते थे। नौकरी छोड़ वे नांदेड़ में रहने लगे थे।

18. अब्दुल अमीर शक्करजाति से कसाई अब्दुल कोराले गांव का रहने वाला था और बांद्रा में कमीशन एजेंट का काम करता था। अपने गठिया का इलाज कराने के लिए वह बाबा के पास आया, कुछ दिन द्वारकामाई में रुका और ठीक हो गया।

19. मोरेश्वर प्रधानशांतिकुंज के मोरेश्वर प्रधान पहली बार शिर्डी आए और बाबा के भक्त बन गए। वहीं रहकर उन्होंने लैंडीबाग खरीदकर शिर्डी संस्थान को दान कर दिया।

20. लक्ष्मण रत्नपारखी मामाबाबा लक्ष्मण रत्नपारखी मामा (गांव के ज्योतिष) के स्वप्न में आए और बोले- ‘जल्दी उठ, बापू साहेब जोग समझता है कि मैं मर गया हूं और वह तो आरती नहीं करेगा अत: तू मेरी कांकड़ आरती कर।’ बाद में बापू को जब यह ज्ञात हुआ, तो वे बहुत दु:खी हुए और दोपहर आरती उन्होंने ही की।

21. श्री चन्द्राबाई बोरकरचन्द्राबाई ने बाबा को पानी से दीप जलाते हुए अपनी आंखों से देखा था। बाबा के शरीर त्याग के समय चन्द्राबाई बोरकर उनके पास ही थीं। चन्द्राबाई को बाबा ने स्मृतिस्वरूप अपना एक दांत भी दिया था जिसे उन्होंने संभालकर रखा। आज भी उनके घर पर यह दांत सुरक्षित रखा है।

22. माधव फासलेमाधव को बाबा ने नई जिंदगी प्रदान की। फासले प्रयाग स्नान कर बाबा के लिए संगम जल लेकर आया था। जाते समय बाबा ने अपनी कफनी और 10 रुपए उसे दिए थे। फासले से ही बाबा की ईंट टूटी थी और वह बहुत दु:खी हुआ था। तब बाबा ने कहा था बस अब मेरा अंतिम वक्त आ गया है।

23. बापूसाहेब जोगबापूसाहेब का पूरा नाम सखाराम हरि जोग था। पुणे में रहते थे और रामनवमी के दिन बाबा के दर्शन करने के लिए आए। दर्शन का इतना प्रभाव पड़ा कि वे हमेशा के लिए शिर्डी में ही रुक गए। मेघा के देहांत के बाद बापूसाहेब ही बाबा की तीनों समय की आरती करते थे। बापूसाहेब कभी-कभी बाबा की पालकी में बाबा के सिर पर छाता पकड़कर चलते थे। साखुरी में दत्तात्रेय मंदिर के पास ही इनकी समाधि है।

24. उपासनी महाराजउपासनी महाराज शिर्डी आए और करीब 4 वर्षों तक खण्डोबा मंदिर में रहे। भाई कृष्णाजी अलीबागकर की अभीप्सा से नीम तले ‘हरि चरण’ की स्थापना उपासनी महाराज के द्वारा काका साहेब दीक्षित और दादा केलकर की उपस्थिति में हुई।

25. रायबहादुर हरि विनायक साठे : साठे पहली बार शिर्डी आए तो इनके लिए बाबा खुद तांगा और तांगेवाला बन गए थे। उन्होंने शिर्डी में साठेवाड़ा का निर्माण कराया था। प्रसव के समय मैनाताई की हालत बिगड़ी तो बाबा ने उदी और आरती पहुंचवाई थी।

26. जी.जी. नारकेनारके शिर्डी प्रवास के दौरान बाबा की आरती के लिए द्वारकामाई पहुंचे। उस समय बाबा बहुत क्रोधित थे और जैसे कि किसी को चेतावनी दे रहे हो। बाबा के इस विचित्र व्‍यवहार को देख नारके ने मन में सोचा कि शायद बाबा पागल है। उसी शाम जब नारके बाबा के दर्शन लाभ ले रहे थे तो बाबा ने नारके से कहा, ‘अरे मैं पागल नहीं हूं।’ यह सुनकर नारके बाबा की अंतरज्ञान की शक्ति को जान गए।

27. काका महाजनीमुंबई के रहने वाले काका महाजनी का विचार एक शिर्डी में सप्ताह ठहरने का था। पहले दिन दर्शन करने के बाद बाबा ने उनसे पूछा, ‘तुम कब वापस जाओगे?’ उन्हें बाबा के इस प्रश्न पर आश्चर्य-सा हुआ। तब उन्होंने कहा, ‘जब आप आज्ञा दें तब।’ बाबा ने कहा, ‘कल ही।’ यह सुनकर काका महाजनी ने तुरंत शिर्डी से प्रस्थान कर लिया। जब वे मुंबई अपने ऑफिस में पहुंचे तो उन्होंने अपने सेठ को अति उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते पाया, क्योंकि मुनीम के अचानक ही अस्वस्थ हो जाने के कारण काका की उपस्थिति अनिवार्य हो गई थी। सेठ ने काका को बुलाने के लिए पत्र लिखा था, जो उनके पते पर वापस लौट आया।

28. भागोजी शिंदेबाबा का जब हाथ जल गया था, तो भागोजी शिंदे ही उनके हाथ पर घी मलने और पट्टी लगाने का कार्य करते थे। भागोजी शिंदे कुष्ठ रोगी थे। चांदोरकरजी बाबा के लिए मुंबई से एक डॉक्टर परमानंद को इलाज के लिए लेकर आए थे लेकिन बाबा ने इंकार कर दिया और वे शिंदे के हाथों घी लगाकर ही ठीक हो गए।

29. एकदशी काशीराम शिंपीशिंपी पर जब एक जंगल में चोरों द्वारा हमला किया गया था तब बाबा ने उन्हें एक रहस्यमय तरीके से बचाया था।

30. श्री तात्यासाहेब नुल्करपंढरपुर के उपन्यायाधीश पहली बार शिर्डी पहुंचे। बाबा ने दादा केल्कर, तात्यासाहेब नूलकर, माधवराव देशपांडे और अन्य लोगों के लिए गुरु पूर्णिमा त्योहार का आयोजन किया।

31. भाऊसाहेब धुमालधुमाल एक मुकदमे के संबंध में निफाड़ के न्यायालय को जा रहे थे। मार्ग में वे शिर्डी उतरे। उन्होंने बाबा के दर्शन किए और तत्काल ही निफाड़ को प्रस्थान करने लगे, परंतु बाबा की स्वीकृति प्राप्त न हुई। उन्होंने उन्हें शिर्डी में 1 सप्ताह और रोक लिया। इसी बीच में निफाड़ के न्यायाधीश उदर पीड़ा से ग्रस्त हो गए। इस कारण उनका मुकदमा किसी अगले दिन के लिए बढ़ाया गया। एक सप्ताह बाद भाऊसाहेब को लौटने की अनुमति मिली। इस मामले की सुनवाई कई महीनों तक और 4 न्यायाधीशों के पास हुई। फलस्वरूप धुमाल ने मुकदमे में सफलता प्राप्त की और उनका मुवक्किल मामले में बरी हो गया।

32. मुले शास्त्रीनासिक के प्रसिद्ध ज्योतिष, वेदज्ञ, 6 शास्त्रों सहित सामुद्रिक शास्त्र में भी पारंगत मुले शास्त्री एक बार नागपुर के धनपति सांईं भक्त बापूसाहेब बूटी के साथ शिरडी पधारे। हस्तरेखा विशारद होने के नाते मुले शास्त्री ने बाबा के हाथ की परीक्षा करने की प्रार्थना की, परंतु बाबा ने उनकी प्रार्थना पर कोई ध्यान न देकर उन्हें 4 केले दिए और इसके बाद सब लोग वाड़े को लौट आए। वाड़े से लौटने के बाद में आरती के समय बापूसाहेब से बाबा ने कहा कि वो मुले से कुछ दक्षिणा ले आओ। मुले जब दक्षिणा देने के लिए तो वे मस्जिद के बाहर ही खड़े रहकर बाबा पर पुष्फ फेंकने लगे। लेकिन जब उन्होंने ध्यान से देखा तो उन्हें बाबा की जगह उनके कैलासवासी गुरु घोलप स्वामी दिखाई देने लगे। वे उनकी स्तु‍ति करने लगे और जब आंख खोली तो उन्हें बाबा को दक्षिणा मांगते हुए देखा। ये चमत्कार देखकर उनका संशय दूर हो गया।

33.एक मामलतदार डॉक्टरएक डॉक्टर अपने सांईंभक्त मित्र के साथ शिर्डी पधारे। उन्होंने मित्र से कहा कि तुम ही दर्शन करने जाओ, मैं नहीं जाऊंगा, क्योंकि मैं श्रीराम के अलावा किसी के समक्ष नहीं झुकता। खासकर किसी यवन के समक्ष और वह भी मस्जिद में तो कतई नहीं। मित्र के कहा कि तुम्हें वहां कोई झुकने या नमन करने को कोई बाध्य नहीं करेगा। अत: मेरे साथ चलो, आनंद रहेगा। वे शिर्डी पहुंचे और बाबा के दर्शन को गए। परंतु डॉक्टर को ही सबसे आगे जाते देख और बाबा की प्रथम चरण वंदना करते देख सबको बड़ा विस्मय हुआ। लोगों ने डॉक्टर से पूछा कि क्या हुआ? डॉक्टर ने बतलाया कि बाबा के स्थान पर उन्हें अपने प्रिय ईष्टदेव श्रीराम के दर्शन हुए और इसलिए उन्होंने नमस्कार किया। जब वे ऐसा कह ही रहे थे, तभी उन्हें सांईंबाबा का रूप पुन: दिखने लगा। यह देख वे आश्चर्यचकित होकर बोले कि ‘क्या यह स्वप्न है? ये यवन कैसे हो सकते हैं? अरे! अरे! यह तो पूर्ण योग-अवतार हैं।’ बाद में वे डॉक्टर वहीं रुके और उन्होंने परम अनुभूति का अनुभव किया।

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