तो शिर्डी में सांईं नहीं, कृष्ण मंदिर होता | So there would have been a Krishna temple in Shirdi, not Sai?

So there would have been a Krishna temple in Shirdi, not Sai?

शिर्डी के सांईंबाबा के खेल निराले हैं। कट्टर धार्मिक युग में व्यक्ति हर संत को धर्म के आईने में देखना चाहता है। कट्टरपंथी हिन्दू भी जानना चाहते हैं कि वे हिन्दू थे या मुसलमान।

यदि मुसलमान थे तो फिर हम उनकी पूजा क्यों करें? मुसलमान भी जानना चाहते हैं कि अगर यदि वे हिन्दू थे तो फिर हम उनकी समाधि पर जाकर जियारत क्यों करें?

सांईंबाबा के बारे में अधिकांश जानकारी श्रीगोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर द्वारा लिखित ‘श्री सांईं सच्चरित्र’ से मिलती है। मराठी में लिखित इस मूल ग्रंथ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

यह सांईं सच्चरित्र सांईंबाबा के जिंदा रहते ही 1910 से शुरू की जाकर 1918 में उनके समाधिस्थ होने तक इसका लेखन चला। इस लेख की सामग्री इसी पुस्तक से ली गई है। आओ हम जानते हैं एक ऐसा सच, जो कम ही लोग जानते होंगे।

वह यह कि आज शिर्डी में जहां सांईं बाबा का भव्य मंदिर बना हुआ है, कभी वहां श्रीकृष्‍ण का मंदिर बनाने की योजना थी। आखिर कैसे योजना बदल गई? या कैसे वह सांईं का मंदिर बन गया? जानिए एक सच.

ईंट से जुड़ीं यादें : सांईं बाबा के पास एक ईंट हमेशा रहती थी। वे उस ईंट पर ही सिर रखकर सोते थे। उसे ही उन्होंने अपना तकिया बनाकर रखा था। दरअसल, यह ईंट उस वक्त की है, जब सांईं बाबा वैंकुशा के आश्रम में पढ़ते थे।

वैकुंशा के दूसरे शिष्य सांईं बाबा से वैर रखते थे, लेकिन वैंकुशा के मन में बाबा के प्रति प्रेम बढ़ता गया और एक दिन उन्होंने अपनी मृत्यु के पूर्व बाबा को अपनी सारी शक्तियां दे दीं और वे बाबा को एक जंगल में ले गए, जहां उन्होंने पंचाग्नि तपस्या की। वहां से लौटते वक्त कुछ कट्टरपंथी लोग सांईं बाबा पर ईट-पत्थर फेंकने लगे।बाबा को बचाने के लिए वैंकुशा सामने आ गए तो उनके सिर पर एक ईंट लगी। वैंकुशा के सिर से खून निकलने लगा। बाबा ने तुरंत ही कपड़े से उस खून को साफ किया।

वैंकुशा ने वहीं कपड़ा बाबा के सिर पर तीन लपेटे लेकर बांध दिया और कहा कि ये तीन लपेटे संसार से मुक्त होने और ज्ञान व सुरक्षा के हैं। जिस ईंट से चोट लगी थी, बाबा ने उसे उठाकर अपनी झोली में रख लिया। इसके बाद बाबा ने जीवनभर इस ईंट को ही अपना सिरहाना बनाए रखा। सन् 1918 ई. के सितंबर माह में दशहरे से कुछ दिन पूर्व मस्जिद की सफाई करते समय एक भक्त के हाथ से गिरकर वह ईंट टूट गई। द्वारकामाई में उपस्थित भक्तगण स्तब्ध रह गए। सांईं बाबा ने भिक्षा से लौटकर जब उस टूटी हुई ईंट को देखा तो वे मुस्कुराकर बोले- ‘यह ईंट मेरी जीवनसंगिनी थी। अब यह टूट गई है तो समझ लो कि मेरा समय भी पूरा हो गया।’ बाबा तब से अपनी महासमाधि की तैयारी करने लगे।

नागपुर के प्रसिद्ध धनी बाबू साहिब बूटी बाबा के बड़े भक्त थे। उनके मन में सांईंबाबा के आराम से निवास करने हेतु शिर्डी में एक अच्छा भवन बनाने की इच्छा उत्पन्न हुई। बाबा ने बूटी साहिब को स्वप्न में एक मंदिर सहित वाड़ा बनाने का आदेश दिया तो उन्होंने तत्काल उसे बनवाना शुरू कर दिया।

बाबा की आज्ञा से मंदिर में द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करने की योजना थी।भवन का निर्माण हो चुका था। मंदिर के निर्माण के बाद मूर्ति स्थापना की जगह भी निर्धारित हो चुकी थी। तभी 1918 में विजयादशमी के कुछ दिन पूर्व सांईं बाबा ने अपने परमप्रिय भक्त रामचंद्र पाटिल से विजयादशमी के दिन तात्या के मृत्यु की भविष्यवाणी की। 

सांईं बाबा शिर्डी की निवासिनी वायजाबाई को ‘मां’ कहकर संबोधित करते थे और उनके एकमात्र पुत्र तात्या को अपना छोटा भाई मानते थे। दोनों से अनन्य प्रेम होने के कारण सांईंनाथ ने तात्या की मृत्यु को टालने के लिए उसे जीवनदान देने का निर्णय ले लिया। 27 सितंबर 1918 से सांईंबाबा के शरीर का तापमान बढ़ने लगा और उन्होंने अन्न भी त्याग दिया। 

उनकी देह क्षीण हो रही थी, लेकिन उनके चेहरे का तेज यथावत था। 15 अक्टूबर 1918 को विजयादशमी के दिन तात्या की तबीयत इतनी बिगड़ी कि सबको लगने लगा था कि अब वह नहीं बचेगा, लेकिन दोपहर 2.30 बजे तात्या के स्थान पर सांईंबाबा ने अपनी नश्वर देह को त्याग दिया और तात्या उनकी कृपा से बच गया। लेकिन बाबा की यूं अचानक देह त्याग के बाद भक्तों को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें।

महासमाधि के पूर्व सांईंबाबा ने अपनी अनन्य भक्त श्रीमती लक्ष्मीबाई शिंदे को आशीर्वाद के साथ 9 सिक्के देने के पश्चात कहा था- ‘मुझे मस्जिद में अब अच्छा नहीं लगता है इसलिए तुम लोग मुझे बूटी के पत्थर वाड़े में ले चलो, जहां मैं आगे सुखपूर्वक रहूंगा।’बाबा ने महानिर्वाण से पूर्व अपने अनन्य भक्त शामा से भी कहा था- ‘मैं द्वारकामाई और चावड़ी में रहते-रहते उकता गया हूं। मैं बूटी के वाड़े में जाऊंगा, जहां ऊंचे लोग मेरी देखभाल करेंगे।’

विक्रम संवत् 1975 की विजयादशमी के दिन अपराह्न 2.30 बजे सांईंबाबा ने महासमाधि ले ली और तब भक्तों ने निर्णय लेकर बूटी साहिब द्वारा बनवाया गया वाड़ा (भवन) में स्थित मूर्ति स्थापना के लिए स्थापित जगह जगह पर बाबा को समाधि दे दी। जब बाबा ने समाधि ली उसके कुछ दिन पूर्व ही भव्य मूर्ति निर्माण का ऑर्डर दे दिया गया था

लेकिन बाबा के समाधि लेने के बाद हिन्दू और मुसलमानों के बीच विवाद हो गया। यह विवाद 36 घंटे तल चला तब अहमदनगर में कलेक्टर के समक्ष दोनों पक्ष एकमत हुए।मुसलमान चाहते थे कि बाबा को कब्रिस्तान में दफनाया जाए जबकि हिन्दुओं के अनुसार बाबा की इच्छा थी कि वे अब अपना जीवन वाड़े में ही बिताना चाहते हैं। बाद में हिन्दुओं के पक्ष से मुसलमान भी सहमत हो गए।

बाद में भक्तों ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि इस जगह पर श्रीकृष्ण की मूर्ति स्थापना करने की योजना थी और इसकी आज्ञा स्वयं बाबा ने दी थी। सांईं के साथ के सभी लोग स्वर्ग सिधार गए, तब कुछ वर्षों पश्‍चात बाबा के समाधि स्थल के पास कालांतर में सांईं बाबा की भव्य मूर्ति स्थापित कर दी गई। मूर्ति स्थापना के बाद वह स्थल साईं समाधि और मूर्ति स्थल बन गया, जो आज एक मंदिर की शक्ल में खड़ा है।

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